एक बात ऐसी है
एक रात बीती है
दो थे अनजान
ये बात ही ऐसी है
ना जाने हुआ क्या
ना जाने होगा क्या
कुछ चाहा था दोनो ने
कुछ चाहा है दोनो ने
जो था वो अब ना है
तो क्या जो चाहिए,
वो भी ना ले?

झाँका आँखों में एक दूसरे के
शायद रूह तक पहुँचे हो
कुछ था ज़बान पे दोनो के,
फिर भी चुप क्यों बैठे हो

शाम बीती, रात बीती
बीती सुबह सुहानी
फिर भी चुप बैठे दो अनजान
जो जान चुके थे दूसरे की कहानी

सन्नाटे के शोर में
गूँज उठी ये बातें
फिर भी ना बोल सके यें
दिल की ये मुरादें

एक डर बसा है अंदर
दुनिया नहीं है सुंदर
डरे समय से डरे वक़्त से
नहीं नसीब भी साथ दे
है ये डर का भीषण समंदर

दो थे अनजान
ये बात ही ऐसी है
अब ना रहे अनजान
तो बनते क्यों है?

– क्षितिज चौधरी

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