महीनों बाद घर आया हूँ
माँ ने है मटन बनाया
बादल गुर्राए
और आज बारिश में भीगने को मिला |

कपड़े गंदे होने का डर नही है
माँ जो है घर पर
डर अगर है तो माँ से डांट का
लेकिन उससे क्या होगा?
बचपन जीने का एक बहाना मिल जाएगा
माँ भी है बड़ी प्यारी सी
कुछ नही बोली वो
खुशी दिख गयी होगी चेहरे पर मेरे |

जब अपने किराये के मकान में रहता हूँ
दिल्ली की कॉन्क्रीट वादियों में भटकता हूँ
बारिश से नफ़रत सी होती है
पीठ पे होता लैपटॉप और जेब मे बटुए के भीगने का खौफ़
जब भी बरसता आसमान
दौड़े भागता चलता हूँ छत की तलाश में
लेकिन आज,
महीनों बाद घर आया हूँ
और बारिश में भीगने को मिला
आज फिर
बचपन जीने को मिला |

– क्षितिज चौधरी


[cover image courtesy: akilliyuva]

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